Sunday, January 4, 2009

"चकला"

आज समाज के चकले में
अपनी मर्जी से
एक नई जुगनी आई है
खरी भी करारी भी
मुज़रे में तेरे मेरे
हमशकल
हूर नुमा साकी के
तलवे चाटते मिलेंगे
बंद नाक से
कांसे के गज़रे सूंघते
खून के कत्थे और
मास के लोथड़ों के
गुलकंद से ठसाठस
पान चबाते
और अपनी ही सफ़ेद
पोशाक पर थूंकते मिलेंगे
कोठे में ...
नीलामी करते दिखेंगे.
तवायफ़ अजीब है
नौलखा लेकर भी
खाली ठिंगन करेगी
दो चार बोल गा देती है
थोड़ा सा पल्लू
सरका देती है
बात तुम्हारे झूठे मान की है
तो अब नीलामी होगी
घंटे के हिसाब से
एक एक करके
दो कौड़ी के उसूल
करोड़ों में
गिरवी रखे जाएंगे
और उसके लंहगे
या फ़िर चोली में
रेशा रेशा बेशर्मियत से
टांक दिया जाएगा .
खुश होकर...
जुगनी अब नाचेगी
नथ उतरने तक
महफ़िल बारी बारी नंगी होगी
कहकहे लगते रहेंगे
जब तक अधेड़ उमर
अपने ही ठहाके से
बहरे ना हो जाएंगे.
अगले दिन होश आए
या फ़िर ठर्रा उतरे
तो बोझिल आंखों के
शटर उठाकर देख लेना
हाथ की उंगली में
टूटी नथ अटका के
लहंगे में तुम ही तो पड़े थे
रात भर कहरवे पर
'मधुबन में राधिका'
तुम ही तो नाचे थे .
शर्मिंदा मत होना ,
क्योंकि अगली रात
तुम्हारे गिरहबान
के सीखचे से
एक नई जुगनी झांक रही होगी
और कागज़ की रंडी बनने को
तैयार खड़ी होगी ....
अपना ही मुज़रा देखने को ..
गिरवी रखने को ..
दो चार उसूल लाए हो ना ...?

Thursday, January 1, 2009

बेसर

मेरी सोनजुही-पीला केसर
मेरी छनक धनक की नथ बेसर
मेरी अंखियों बसी,घुली हैरानी
बतियन मिसरी , दादी, 'नानी'
चटक रंग अल्हड़ छोरी
मेरे प्यार पगी कोरी कोरी
मेरी एक ख़ुदा , मेरी एक ख़ुदाई
मीर गज़ल , खैय्याम रुबाई
ओस-पलाशों की ओ छिटकन
मन्नत-मिन्नत-आलिंगन
तू जैसी है वैसी ही बनकर
पोने पोने पैरों चलकर
बिना तकल्लुफ़, बिना अर्ज़
बस हिया लगाए एक मर्ज़
बस धड़कन की ही तर्ज़-तर्ज़
दो चुम्बन प्यारे खर्च-खर्च
मेरे होंठो पर सिलने आ जा
सब छोड़ छाड़ रहने आ जा
'वो' कानों में कहने आ जा
तू जैसी है वैसी बनकर..
सब छोड़ छाड़ रहने आ जा ...

Thursday, October 23, 2008

सारी रात



रात,
स्वप्न की कुबड़ी लुगाई
नयन तले झाईं

रात,
नूर धुली कासी
चांद चढ़ा फ़ांसी

रात,
थकी पलकों की छीलन
अशेष नयनोन्मीलन

रात,
चंदा की मुहदिखाई
तारों की परजाई

रात,
करवट की दुकान
बिकाऊ पागल 'सचान'

रात,
गर्भवती दिमाग
प्रसव पीड़ा की जाग

रात,
सज़ा-ए-आफ़्ता गज़ल
खुदा ना खांसता ,बेदखल

रात,
झींगुर की गवाई
ढूंढी तकिया तले पाई

रात,
तेरे खयालों की चरसी
झपकी भर को तरसी

रात,
सब साली बातें
फ़िर भी ज़ाया रातें

" सैंतालिस "

मैं जिस जगह की बात कर रहा हूं वो लाहौर का सबसे जीवंत घर है . जीवंत इस मायने में कि जीवन यहां अपने सम्पूर्ण शबाब पर तकरीबन २५० वर्ग फ़ीट को अस्तित्व देने के अपने धंधे में बाकायदा सफ़ल हो पाया था.इस घर की दीवारों पर तस्वीरें नहीं हैं क्योंकि चेहरों पर तमाम तस्वीरें इतनी आशनाई से हर घड़ी खुशनुमा होती रहती हैं कि उन्हें दीवारों पर टांगने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती. छतों पर फ़ानूस नहीं लटकते , कण्डीलें नहीं टंगी हैं क्योंकि यहां उनकी खनक की कमी मुस्कुराहटों से पूरी कर दी जाती है . रईसियत के असबाब भी कमती ही नुमाया हैं क्योंकि यहां उन्हें जुटाने की न तो फ़ुरसत ही है किसी को और ना ही तकल्लुफ़ तनिक सा .
आंगन में नौ वर्ष की एक लड़की बैठी हुई है जो अपनी हंथेलियां एकान्तर क्रम में अलट पलट कर उन पर कभी पत्थर के गोल टुकड़े उछालती संभालती रहती है तो कभी फ़र्श पर एक मंझी हुई न्रित्यांगना की लचक और हनक के साथ चौकोर खानों के बीच लंगड़ी टांग खेल्ने लगती है . कुछ को ये किसी गौरैया का फ़ुदकना लग सकता है और बाकियों को कुछ भी नहीं क्योंकि उनके लिए मासूमियत के चोखे मोहपाश से बाहर निकलकर कुछ भी सोच पाने के स्थिति में खुद को ला पाना बेहद मुश्किल होता .
"बेबे हम कहां जा रहे हैं ? "
"पंजाब !! कितना मज़ा आएगा ना , मैंने ना वहां भी सारा दिन गोटियां ही खेलनी हैं और जब थक जाऊंगी ना तो खेलूंगी लंगड़ी टांग ....और फ़िर भी थक गई ना तो ....तो टांग बदल कर खेलूंगी लंगड़ी टांग ."
"एक दो तीन चार पांच ....पांचवां खाना ....
पांच चार तीन दो एक....घर - धप "
फ़िर लड़की कुछ गहरी सोच में कान पर हिफ़ाज़त से अटकी एक घुंघराली लट निकालकर उस पर उंगली से छल्ले बनाने लगी और अगले ही क्षण सारे छल्लों के एक लाइन में खींचकर होंठ पर मूंछ जैसी लगाकर खुद से बोली , "लेकिन दोनों टांगे थक गईं तब...तब तू क्या करेगी मंजीते?"
"मां ...क्या करूंगी मैं तब ? "
"तब मैं तेरे साथ खेलूंगी ...तू खेलेगी ना मेरे साथ बेबे....मेरी अच्छी बेबे..."
"हां मेरी चिड़ी ,खेलूंगी तेरे साथ. अच्छा ये ले , इसे चुन्नी के छोर से बांध ले अपनी "
"क्या है इस पुड़िया में बेबे ? "
"जादूगरनी की पुड़िया है मंजीते , जादूगरनी ने कहा था कि जब भी कलेजा घबराए तो एक सांस में फ़ांक लेना पूरी और चुटकी में सब चंगा "
"सब चंगा..!! जादूगरनी बेबे का चूरन "
लड़की हंसी और अगले ही पल आंख नचाती हुई बोली ....
"लेकिन मां ये छुरी क्यों बांधनी है कुर्ती से ? मैंने क्या कोई सब्जियां छीलनी हैं अम्रितसर जाकर . मैंने नी करना कोई काम वाम वहां ...बताए देती हूं बेबे "
"हां रे मेरी गुड़िया . बस ऐनू बांध ले तू . सिखणियां बांधती हैं ना इसे और तू है ना लाहौर की शेरनी "
लड़की सगर्व मुस्कुराती है ..."लाहौर की शेरनी....मंजीत कौर"
बताना मुश्किल होता है कि ऐसे में स्त्री-सुलभ गर्व अधिक खूबसूरत दिखता है या फ़िर मुस्कुराहट . लड़की फ़िर से खेलने में मशगूल हो गई .
"एक दो तीन चार पांच ....पांचवां खाना ....
पांच चार तीन दो एक....घर - धप "
"अरे कौन है दरवाज़े पर ? ...अरे भई इतनी ज़ोर से मत पीटो कुंडी किवाड़ ही टूट जाए....आ रही हूं ना "
"अरे कहा ना मत पीटो "
बेबे ने मंजी की बांह पकड़ कर उसे झटके से पीछे खींच लिया .
"नहीं खोलना दरवाज़ा , अंदर चल चुपचाप "
"नहीं खोलूं दरवाज़ा ? अरे देखने दे ना कौन है "
क्या...! अरे देखने दे ना "
बेबे उसे खींचकर घर के सबसे भीतर वाले कमरे में ले गई और किवाड़ सांकल से सटा दिए . धीरे धीरे शोर बढ़ने लगा , जैसे किसी हुज़ूम की आवाजें एक दूसरे के कंधे पर चढ़कर बहुत ऊंची चढ़ती जा रही हों .
"बेबे क्या हो रहा है बाहर ..ये लोग दरवाज़ा क्यों पीट रहे हैं ...
मां तू इतना कांप क्यों रही है ?
अरे कोई नहीं है मां , शायद दारजी होंगे दरवाज़े पर , मैं देख कर आती हूं अभी ..."
लड़की उठती कि उससे पहले भीड़ ने खिड़कियों से मशालें और पत्थर फ़ेंकना शुरू कर दिया था . दरवाज़े पर लट्ठों से लगातर ठोकरें मारी जा रही थीं .
अब तक मंजीत को भी समझ आना शुरू हो गया था कि मामला क्या है .
फ़िर भी लड़की मुस्कुराई ...लेकिन थोड़ा मुश्किल से .
"अरे मां तू डर मत ना और अपने पास वो पुड़िया भी है ना ..."
उसकी आंखों में चमक सी आई . मानों कोई तरीका मिल गया हो उनसे निबटने का .
मां ने भी ज़बरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश की और मुस्कुराने में सफ़ल भी हुई . मंजीत को मानो थोड़ा सा आश्वासन सा मिला कि हां वाकई पुड़िया में कुछ तो मंतर है जो उनका डर चुटकी में खतम कर देगा . दोनों ने चुन्नी के छोर से चूरन निकाला और एक झटके में हलक के नीचे धकेल दिया . पुड़िया में सचमुच मंतर था .
असर भी दिखा , दोनों का शरीर धीरे धीरे अकड़ना शुरू हो गया , गठरियां सी गुंथने लगीं . अंतणियां शायद चूरन हज़म नहीं करना चाहती थीं इसलिए सफ़ेद झाग के रूप में उसे मुंह के बाहर पम्प करने लगीं .
लेकिन एक बात तो तय थी कि उसमें मंतर था और डर सचमुच कम हो रहा था . वजह ये थी कि दिमाग के नसें इतनी शिथिल पड़ चुकी थीं कि उन्होंने 'डर' लव्ज़ का आगा पीछा सोचने में असमर्थता जता दी थी. हुज़ूम पागल हो रहा था .अब यहां पर एक दौड़ सी शुरू हो गई थी . दौड़ में हिस्सा लेने वाले तीन थे . छूटती हिम्मत , उखड़ती सांसें और टूटते दरवाज़े . दुर्भाग्य से दौड़ में सबसे आगे थे टूटते दरवाज़े और सबसे पीछे रह गई थी छूटती हुई हिम्मत . इतना भी तय था कि घर का अखिरी दरवाज़ा आखिरी सांस उखड़ने के पहले ही टूट जाता ... या शायद और भी बहुत पहले .
ज़बान से से कानों तक शब्द फ़ेंकने के लिए बहुत हिमम्त और मेहनत की ज़रूरत थी फ़िर भी मंजीत ने दोनों ज़रूरी चीज़ें बटोर कर कहा , " अभी भी डर लग रहा है...तेरी पुड़िया से कुछ नहीं होता "
कम्बख़्त ज़हर भी चोखा नहीं था . सिखणी ने कातर निगाहों से बच्ची को ऐसे देखा मानों उसका झूठ पकड़ा गया हो . शरीर में बची खुची सारी हिमम्त जुटाकर टीन का डिब्बा उठाया , तीन चौथाई मंजीत पर और एक चौथाई खुद पर उड़ेला . मंजीत पर थोड़ा ज्यादा , ताकि वो आसानी से जल सके और खुद पर कमती इसलिए ताकि वह भी जल सके , सुकून से ना सही ...थोड़ी मुश्किल से ही सही ...मगर जल सके . तीली दी गई...दोनों भम्म से जलने लगीं और अगले ही क्षण हुज़ूम ने आखिरी दरवाज़ा भी तोड़ दिया .
हुज़ूम हैरान था , सब के सब सन्न ...कोई हरकत नहीं . फटी आंखों में आग की लपटें आसानी से दिखाई पड़ रही थीं .
" अरे क्या सांप सूंघ गया है हरामियों ?
सोचते क्या हो ?
कुछ सांसे बाकी रह गई हैं सिखणियों में ...
देखते नहीं , अभी भी हरकतें हो रही हैं "
ललकार ने असर दिखाया , हुज़ूम का मौन टूटा .
मयानों से कुछ तलवारें निकाली गईं . दो जलते शरीर संख्या में चार कर दिए गए .
दो जनाने शरीर ....
सौभाग्य से छटपटाने में असमर्थ .
दो जनाने धड़ ....
दुर्भाग्य से छटपटाने में समर्थ .
और बीच में खून की फूटती लाल धार लेकिन इतनी पर्याप्त नहीं कि आग को बुझा सके .
लपट चिढ़ती जरूर थी लेकिन एक छौंक के साथ फ़िर से जलने लगती थी .
लाहौर का सबसे जीवंत घर सैंतालिस की भेंट चढ़ चुका था
और बाकी तमाम चढ़ने की तैयारी में थे.

Friday, September 12, 2008

टोपाज़

उसे मैंने यूनीवर्सिटी के चाय कार्नर पर तमाम बार देखा और लगभग उतनी ही बार नज़रन्दाज़ भी किया . वजह ये थी कि वो किसी भी आलसी लेखक की दिमागी शिराओं से खेलने में सिद्धहस्त था . अपनी वेशभूषा और हरकत मात्र से वो चाय के साथ इतने सवाल छोड़ सकता था कि चाय उस रिवाज़ के साथ पी ही नहीं जा सकती थी जिस रिवाज़ से पीने का मैं शौकीन हूं . वो बिना शर्ट के लम्बे गले के दो ऊनी कत्थई स्वेटर , घुटने तक मुड़ी ख़ाकी पैंट में अपनी हरी पालीथीन के साथ कटिंग का कुल्हड़ लिए अमूमन दिख जाता था .यूनीवर्सिटी की लड़कियों को दरकिनार करके उसे घूरना दुस्साहस भी कहलाता , बेवकूफ़ी भी और ध्रिष्टता भी इसलिए मैंने कभी भी उसे इससे ज्यादा गौर से नहीं देखा था. वो अक्सर खुद की लिखी किसी कहानी या फ़िर अपने किसी नाटक की स्क्रिप्ट के साथ एक कटिंग पर घंटों गुजार दिया करता था .
उसके बारे में कालेज में कई तरह की बातें थीं , जैसे कि वो कुछ वर्ष पहले अपना मानसिक संतुलन खो बैठा था फ़िर भी वो पूरा पागल नहीं था बस थोड़ा सनकी था , वो मेकैनिकल डिपार्टमेंट में १२ वर्ष प्रोफ़ेसर रह चुका था और थिएटर का ख़ासा शौकीन हुआ करता था .मेरा ताल्लुक उससे बस इतना था कि उसने मुझे कुछ एक बार अपने नाटक की स्क्रिप्ट थमा दी थी जो की वो साप्ताहिक तौर पर लिखता था और कुछ एक लोगों को बांटकर उनकी टिप्पणियां जानने की कोशिश करता था . इस लिहाज़ से मेरे लिए उसे पागल मान लेना असंभव था और यदि संभव था भी तो मैं मानना नहीं चाहता था.
आज पूरे चाय कार्नर पर ग्राहकों के नाम पर बस दो लोग थे ...मैं और वो स्क्रिप्ट रायटर . 'वो' कहना बहुत अजीब लग रहा है इसलिए आगे से मैं उसे रायटर कह कर संबोधित करूंगा पर शब्द के वज़न से आप ये मत भूलिएगा कि वो था तो आखिरकार एक पागल ही .
रायटर अपने चाय के गिलास के उत्तल और अवतल हिस्से के आर पार मुझे झांक रहा था .मुझे इस बात का इल्म तो था लेकिन मैं नहीं चाहता था कि उसे भी इस बात की जानकारी हो और वो आकर मुझे तंग करे . ख़ैर फ़िर भी वो उठा और साधिकार मेरे बगल में आकर बैठ गया .
"पढ़ो इसे" ...उसने हरी पालिथीन से अपने नई स्क्रिप्ट निकाल कर मुझसे कहा .
"क्या है ? "
"अरे स्क्रिप्ट है...इस बार थोड़ा थर्ड फ़ार्म में लिखा है क्योंकि नाटक के फ़र्स्ट और सेकेण्ड फ़ार्म में मुझे वो गहराई नुमायां नहीं होती . शब्दों के बीचों बीच नज़र और दिमाग को कसरत ही ना करनी पड़े तो बात ही क्या ! "
"मुझे तुम्हारी लिखावट समझ मे नहीं आती , तुम ही पढ़ दो "
" लिखावट समझ मे नहीं आती !!! ...फ़िर मेरी बाकी स्क्रिप्ट्स पर तुमने जो प्ले बनाए हैं ...वो कैसे ? "
"तुम्हारी स्क्रिप्ट पर ! नहीं जी ..मैं खुद लिखता हूं या फ़िर बड़े बड़े नाटककार जैसे विजय तेंदुलकर , महेश दत्तानी , महेश अलकुंचवर और बादल सरकार के प्ले उठाता हूं ...नाम सुने होंगे शायद ..."
"हां....तेंदुलकर जी के हर नाटक का केंद्र बिंदु एक सताई हुई औरत होती है , बादल बाबू ज़रूर कुछ तगड़े थे , महेश को मैंने ज्यादा पढ़ा नहीं क्योंकि उसकी सोच पर मुझे पश्चिम की छौंक पसन्द नहीं आती "
मैं अवाक भी था और हैरान भी . उससे ये मेरा दूसरा कन्वर्सेशन ही था लेकिन मैं ये निश्चित नहीं कर पा रहा था कि उमर के अर्ध शतक के उस पार खड़ी वो चीज़ आखिर थी क्या . ख़ैर बीच बीच में वो कुछ ऐसी हरकतें कर जाता था कि मुझे पक्का हो जाता था कि वो चीज़ क्या थी....'पागल' और क्या....क्योंकि वो नाक में उंगली से कुछ खोज- खोद करने के पश्चात उसी उंगली से कान खुजाता और फ़िर उसी उंगली से समोसे का आलू खोद खोद कर खाने लग जाता .
"तुम्हीं पढ़ दो ना यार ...."
"ठीक है, मैं सुना देता हूं पढ़कर .नाटक का शीर्षक है-'स्वर्ग में परमाणु परीक्षण'
"क्या ? "
"स्वर्ग में परमाणु परीक्षण "
"चिगो चिध चिन-चिगो चिध चिन...इन्द्रदेव सावधान ! हमारे खूफ़िया राडार ने पता लगाया है कि काशीराम और मायावती का ब्रेक अप हो गया है . जुलाब की दवाओं की आकस्मिक कमी आ पड़ी है इअलिए स्वर्ग के पोखर में पोखरण करना ज़रूरी हो गया है .चिगो चिध चिन-चिगो चिध चिन !..चित्रगुप्त सावधान ....यमराज के भैंसे से कह दो कि वो पोखर में पानी पीने ना जाए क्योंकि कोबाल्ट के रडिएशन से उसके दिमाग में छेद हो सकता है . "
"अभी सिर्फ़ प्लाट ही लिखा है ..शायद समझ नहीं पा रहे होगे....असल में थर्ड फ़ार्म के कुछ कंस्ट्रेंट्स होते हैं ना.. "
थर्ड फ़ार्म .... ? बाबा जी का घंटा ...क्या था ये ? ऐसा वाहियात इंसान पागल ही हो सकता है .
काश इन्हीं शब्दों में मैं उसे टिप्पणी दे पाया होता फ़िर भी मुझे एक सुरक्षित पालीटिकल जवाब देना पड़ा..."अच्छा है"
"ख़ैर इसे छोड़ो...मैं एक और बात सोच रहा था ..."
अब क्या....!!!
" डू यू थिंक दैट द वैल्यू आफ़ जी वाज़ ९.८१ ऐट द टाइम आफ़ महाभारत ? "
"जी ? "
"येस...'जी' ....ग्रेविटेशनल कांस्टैंट ...यू मस्ट नो ना ..."
"अच्छा...जी...या या...दैट मस्ट बी "
"देन हाउ कम भीम लिफ़्ट अ ट्वेंटी क्विंटल ट्री ? ..आई कैन प्रूव दैट इट वाज़ वैरिएबल.... बिफ़ोर लिफ़्टिंग इट ही यूज्ड टू चेंज इट टू जी बाए हंड्रेड . "
"जी जी.."
"चलो अच्छा चलता हूं .सोमवार को हैदराबाद गेट पर टोपाज़ का ग्यारवां शो होगा , देखने ज़रूर आना , कुछ सीखने को मिलेगा "
"जी ठीक .."
"जी ! ...जी ? ...९.८१ ? "
चार दिन बाद ...हैदराबाद गेट ...

"चिगो चिध चिन- चिगो चिध चिन "
"सावधान सावधान ...
कला के कई प्रकार
ना कोई आकार
फ़िर भी साकार
करने को बूढ़ा कलाकार
तालियां मेरा भोजन
तालियां मेरा आहार
पेट भर तालियां , छोटी मोटी गालियां
बजाओ ताली...
चिगो चिध चिन , चिगो चिध चिन "
थोड़ी बहुत भीड़ इकट्ठा हो चुकी थी और उसे ये समझने में वक्त नहीं लगा था कि आज फ़िर टोपाज़ का शो करने के लिए प्रोफ़ेसर हल्ला मचा रहा है .उसके इर्द गिर्द जमा होने वाली भीड़ में सिर्फ़ नए लोग ही होते थे क्योंकि वो पिछले तीन महीने से वही नाटक करने के लिए यूनीवर्सिटी के अलग अलग चौराहों पर ढोल लेकर पहुंच जाता था . फ़िर भी भीड़ का एक ख़ास स्वभाव होता है कि वो जमा बिना किसी वज़ह के होती है और तितर बितर किसी ख़ास वज़ह से ही होती है इसलिए वो हमेशा ४०-५० लोगों को इकट्ठा करने में सफ़ल हो जाता था . नए लोग ये जानने के लिए खड़े थे कि ये क्या करने वाला है और पुराने लोग ये जानने के लिए कि ये आज नया क्या करने वाला है .
"मैं हूं लेखक बड़ा अनोखा
मेरा लिक्खा सबसे चोखा
खुद ही लिखता
खुद ही पढ़ता
बड़े शौक से खुदी फ़ाड़ता
मेरी शैली सबसे भिन्न
चिगो चिध चिन्न , चिगो चिध चिन्न
नाटक का नाम है - 'टोपाज़ '
बजाओ ताली ...."
भीड़ जमा होती देख दो यूनीवर्सिटी के गार्ड उसकी ओर बढ़े .
"ए प्रोफ़ेसर, चल भाग यहां से "
"चले आए पोखरण के चौकीदार , देखो क्लाइमैक्स है , तमीज़ से हो जाने दो , चलो तुम भी खड़े हो जाओ वहां ...चिगो चिध चिन ..चिगो चिध चिन "
"अबे भैंचो हटता है कि नहीं "
"बोला ना कि क्लाइमैक्स है नाटक का "
"अबे हां पता है तेरा क्लाइमैक्स ,हर हफ़्ते देखते हैं कि क्लैमैक्स मे कलाकार अपना हांथ टोपाज़ से काट लेता है "
" अरे आज़ कहानी में ट्विस्ट है ...कलाकार क्या करता है कि..."
"अबे हां हां पता है ...चल भाग "
"अरे...कलाकार अपने जेब से टोपाज़ निकालता है ...क्या ? ...टोपाज़ ...और फ़िर टोपाज़ से अपनी कलाई की नस काट लेता है...ये दाहिने हांथ की और ये बांएं हांथ की
फ़िर जनता को जाता है सांप सूंघ
क्या बीच बज़ार हो गया खून ?
जनता बजाती है ज़ोरदार ताली
ज़ोरदार ताली छोटी मोटी गाली
जनता को जाता है सांप सूंघ
क्या बीच बज़ार हो गया खून ?
चिगो चिध चिन चिगो चिध चिन "
इतना कह के प्रोफ़ेसर सांस रोक कर सड़क पर लेट जाता है .
"अबे हां ठीक है ...अब चल भाग यहां से "
एक आध मिनट में भीड़ भी छट जाती है और प्रोफ़ेसर भी उठ खड़ा होता है . अपनी हरी पालीथीन उठाता है और चल देता है .
थोड़ी दूर पर जाकर उसी चाय कार्नर पर जाकर बैठ जाता है .
"साले ने सब चौपट कर दिया , दो मिनट और चल जाने देता तो क्या बिगड़ जाता साले का
, अरे साला जनता को तालियां तो बजाने देता , साला नाटक में ट्विस्ट आना अभी बाकी था ना . लोग आज पक्के से तालियां बजाते ज़ोरदार तालियां ..."
उसके कत्थई स्वेटर की स्लीव्स पर कत्थई रंग और गहरा होकर तेजी से चढ़ने लगता है ..
गहरा भूरा...
गहरा कत्थई..
गहरा लाल-काला....
आज सचमुच नाटक में ट्विस्ट था...
किसी ने ध्यान ही नहीं दिया ...
टोपाज़...

Tuesday, September 9, 2008

"पेशवा बाजी राव "

कहानी का समय १९७५ का आषाढ़ और स्थान ग्वालियर में एक लेखपाल का दो मंजिला घर और संख्या तकरीबन ढाई भोले भाले जीव. चेखव, उसकी मां और बाउ जी.
"मां आज मेरे लिए क्या बनाने वाली है ?"
"कढ़ी.."
"बढियां ! ..लेकिन देख मां , हमेशा की तरह कम खट्टा नहीं चलेगा मुझे . आज सब चीज चंगी चाहिए मुझे . भात भी बनाना , चौबे जी कहते हैं कि उनकी तंदुरुस्ती का राज कढ़ी और भात है "
और फ़िर चेखव की चिर परिचित खिल खिलाहट , जो कि किसी प्राइमरी पाठशाला में क्लास ख़त्म होने पर बजने वाले घंटे सी प्रतीत होती थी .
"मां ग्वालियर नरेश को आवाज़ लगाना, मैं अभी कमरे में जाकर पाठ याद करने जा रहा हूं.कल यदि पटवर्धन चौबे जी को याद कर के नहीं सुनाया तो कहेंगे-
"मूर्ख चेखव , हांथ आगे तो करो ज़रा. तुम्हारी हंथेलियों और हमारी बेंत की संगत की जाए तो देखो कैसे बिना तबले के कहरवा के बोल निकल आते हैं ! "
पुनः वही हंसी और हंसी का पीछा करते करते पंजों पर भागते हुए चेखव अपने कमरे में चला गया और वहां कुछ काल्पनिक गड्ढों को फ़ांद कर बचते बचाते अपनी खाट पर कूद गया.
एक गहरी सांस ली , आदतन नाखून से तीन बार नाक खुरची और स्कूल बैग से चार पन्ने निकाल कर कुछ लाइनें रटने लगा .
चेखव शीशे के सामने जाता , पेट पर हांथ फिराता , भिखारियों के से चेहरे बनाता और फ़िर शीशे में झांक कर अपनी लाइनें रटने लगता. भूल जाता तो आप ही गाल पर तमाचा और यदि याद रह जाता तो खुद ही पीठ पर शाबाशी की थपकी.
" अरे ओ ग्वालियर नरेश..नीचे आ...खाना लगा दिया है"
"आया मां "
चेखव ने झट से पन्ने अपने झोले मे सुरक्षित रखे और कुछ बड़ बड़ाते हुए नीचे आ गया .
छोटी चटाई पर पालथी मारी, जंघा पर पटवर्धन जी के कहरवा के बोल जैसा त्रिताल का ठोंका बजाया और कढ़ी की कटोरी के ठीक तीन इंच ऊपर अपनी नाक ले जा कर ज़ोर से सांस खींची , मानो आज मुह से नहीं अपितु नाक से खा जाने का इरादा हो .
"मां ...मां ,,मैंने कहा था ना कि कढ़ी खट्टी बनाना और देख भात भी कैसा चीमड़ हो रक्खा है . मैं नहीं खाता. "
"कहां ? देखूं तो...अरे मैंने तो कच्चे आम की फ़ांकें भी डाली थीं और कहता है कि खट्टा नहीं है ! चुप चाप खाता है कि नहीं ..ठहर वहीं ...आती हूं अभी . "
मां के आने से पहले ही चेखव अपने कमरे में जा चुका था .
"कैसा अजीब लड़का है ये . कल दोपहर से अजीब अजीब हरकतें.कभी शीशे के सामने चेहरे बनाता है तो कभी मुआ जंगलियों की तरह पेट पर हांथ फ़िराकर चिल्लाता है ,पेशवा बाजीराव ..."
"खाना लगवाता है और फ़िर बिना कुछ खाए भाग जाता है . कभी छत पर रोटियां मिलती हैं तो कभी खाट के नीचे से "
अगला दिन..पट्वर्धन चौबे जी का क्लास ...
चौबे जी को घेरे में लिए ७वीं कक्षा के छात्र बमुश्किल खड़े थे. बमुश्किल इसलिए क्यूंकि उत्साह के अतिरेक को काबू में रखने के एवज़ में उनके कूल्हे लगातार मटक रहे थे और वो अपने पंजों पर बार बार उछल उछल कर अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे थे .
माज़रा ये था कि चौबे जी 'पेशवा बाजी राव' नामक नाटक के लिए लौंडों के ओडीशन ले रहे थे.
"मैं मलाठा पेतवा बादीलाव छल्तनत का पत्ता पत्ता अपने निगाह में लक्खूंगा औल मेली नाक के नीचे थुलाफ़ांते तलने की तोशिश भी मत तलना"
तोतले बाजी राव की तोतली सिंह गर्जना सुनकर चौबे जी के लिये अपनी हंसी को रोक पाना उतना ही मुश्किल था जितना की दर्जन भर गुझिया खाने के बाद उनके लिए अपनी डकार रोक पाना होता फ़िर भी तम्बाकू रंगे अधरों के कोने से हंसी का मंद मंद तार सप्तक रिलीज कर के बोले..
"अगला छात्र..."
लड़कों का उत्साह देखते ही बनता था . सब अपने अपने मन का पात्र चुन कर उसकी हू-ब-हू नकल करने की कोशिश कर रहे थे .
अपने बारी आने पर चेखव भी आगे बढा़...आदतन गहरी सांस ..तीन बार नाक खुजाना और फ़िर..
"पेशवा बाजी राव साहब आपका काम सिरफ़ सल्तनत में गुनाह रोकना नहीं है. तीन दिनों से जिन हलक़ के रास्ते अन्न का एक निवाला भी नहीं गया उनकी सुध आपको आएगी भी या नहीं ?आप क्या जानें कि जब हांथ और होंठ के बीच से निवाला छीन लिया जाता है तो क्या बीतती है "
"अरे तेज बोलो मूर्ख . आडिटोरियम में तुम्हारी आवाज़ जब पहली पंक्ति तक भी ना पहुंचेगी तो फ़िर बेज्जती तो होगी पटवर्धन चौबे जी की..वो भी भरे सभागार में "
"पर गुरु जी वो बात ये है कि ..."
"मैंने तीन दिन से कुछ खाया ही नहीं ..ताकि ..."
"गणित कम समझाओ गौरैया ...खाना तुम्हें भरपेट मिला है. नहीं मिला है तो उस देहाती को. समझे..."
"मैंने सचमुच खाना नहीं खाया गुरूजी ...जिससे की मैं ...."
"अरे चलो भी जी...अगला "
चेखव को बहोत गुस्सा आया. जी किया की उनके स्थूल उदर में सुई चुभो कर हवा छोड़ते गुब्बारे जैसा दुनिया से रुख़सत करा दे लेकिन कुछ कह नहीं पाया.ड्रामे के सभी पात्र चुन लिए गए .
चेखव घंटों सड़क पर टहलता रहा . क्रोध , उपेक्षा , कुंठा और दु:ख का सम्मिश्रित भाव चेहरे पर लिए कभी ईंट के टुकडों के लात से मारता तो कभी हांथ से उठा कर खंभों पर मारता.
फ़िर थक कर किनारे बैठ गया . अचानक उसकी नज़र एक भिखारन पर अटक गई जो आधी रोटी लिए टूंग रही थी.
लड़के के दिमाग में पता नहीं क्या आया ...पागल पन था अथवा ख़ुमार..या फ़िर कुंठा..
ठीक ठीक पता नहीं...
चेखव उठा और बुश्कर्ट की बटनें खोल कर उसे झोले में डाला ...बाल बिखेरे..चेहर पर मुट्ठी भर धूल लपेटी ...और अगले ही क्षण उस बुढ़िया के पास जा पहुंचा ...
बोला..."पेशवा बाजी राव साहब आपका काम सिरफ़ सल्तनत में गुनाह रोकना नहीं है. तीन दिनों से जिन हलक़ के रास्ते अन्न का एक निवाला भी नहीं गया उनकी सुध आपको आएगी भी या नहीं ?आप क्या जानें कि जब हांथ और होंठ के बीच से निवाला छीन लिया जाता है तो क्या बीतती है "
बुढ़िया उसे एक टक घूरती रही...निरुत्तर ...
चेखव पुनः बोला..."पेशवा बाजी राव साहब आपका काम सिरफ़ सल्तनत में गुनाह रोकना नहीं है. तीन दिनों से जिन हलक़ के रास्ते अन्न का एक निवाला भी नहीं गया उनकी सुध आपको आएगी भी या नहीं ?आप क्या जानें कि जब हांथ और होंठ के बीच से निवाला छीन लिया जाता है तो क्या बीतती है "
"अरे ओ पेशवा बाजीराव..."
बुढिया को कुछ समझ में तो नहीं आया लेकिन ममता के वशीभूत उसने अपनी आधी रोटी चेखव को थमा दी.चेखव मुस्कुराया ...उसी चिर परिचित अन्दाज में ...वैसी ही पाठशाला के घंटे की आवाज़...लेकिन इस बार कक्षा ख़तम होने की नहीं अपितु मध्यांतर अथवा छुट्टी की लंबी घंटी..."
उसे लगा कि नाटक में रोल के लिए उसे चुना जा चुका था....

Sunday, August 24, 2008

मंत्र मंत्र मातरा मंतव्य मारता
कपोल कल्पना कुतर्क कथ्य काटता
खु़मार ख़ांसता ख़राशें खोदता ख़ुदा
गोपनीय गर्भित गन्तव्य ग़ुमशुदा.