Thursday, January 22, 2009

अल्हड़ छोरी

वो अल्हड़ छोरी जब भी हंसकर
ऑंखें गोल नचाती है
वो गुणा भाग से चिढ़कर पगली
जब नाखून चबाती है
बालों के लट की मूछें जब
उसको अब तक भाती हैं
वो मुह बिचकाकर जामुन जब
नीले अधरों से खाती है
तब तब इस पगले दिल से मेरे
छत्तिस की ठन जाती है
नज़रें मेरी , ऑंखें मेरी
उसकी चाटुक बन जाती हैं .......

वो अल्हड़ छोरी जब भी
हल्दी का उबटन रचवाती है
बाँहों तक मेंहदी भरकर
चुहिया जैसी इठलाती है
वो आँचल के कोनों को जब
दांतों से सिलने लगती है
जब पोने पोने पैरों से
झरने से लड़ने लगती है
तब तब इस पगले दिल से मेरे
छत्तिस की ठन जाती है
नज़रें मेरी , ऑंखें मेरी
उसकी चाटुक बन जाती हैं .....


वो अल्हड़ छोरी जब भी
बगिया में अमिया झरवाती है
वो खाए काम नाचे ज्यादा
क्या चोखा स्वांग रचाती है
वो रातों को छत पर लेटी
जब तारे गिनने लगती है
औ गिनती में गलती पे कुढ़
गिनने दोबारा लगती है
तब तब इस पगले दिल से मेरे
छत्तीस की ठन जाती है
नज़रें मेरी , ऑंखें मेरी
उसकी चाटुक बन जाती हैं .....


वो बाबा की बातों से चिढ जब
मोटे आँसू रोंती है
अम्मा की गोदी में छिप
घंटों मनुहारें लेती है
जब दो पैसे के कम्पट से
खुश होती है , न रोंती है
जब काला खट्टा खा खा के
कुछ भी बोलो ,कर देती है
तब तब इस पगले दिल से
मेरे छत्तीस की ठन जाती है
नजरें मेरी , ऑंखें मेरी
उसकी चाटुक बन जाती हैं .....

वो छोटी सी मटकी लेकर
जब कत्थक करती आती है
अन्जाने में पल्लू को
उस चोली से लटकाती है
जब लगें घूरने लौंडे तो
चट से गाली चिपकाती है
जब छड़ी नीम की थाम वो पगली
घंटों दौड़ लगाती है
तब तब इस पगले दिल से मेरे
छत्तिस की ठन जाती है
नज़रें मेरी आंखें मेरी
चाटुक उसकी बन जाती हैं

वो मौसम की पहली बारिश में
जब उत्पात मचाती है
छोटी छोटी कश्ती को वो
हर तलाब बहाती है
जब उसके होंठों पर बारिश की
खट्टी बूंद पिघलती है
फ़िर जीभ निकाले पगली वो
जब बरसातों को चखती है
तब तब इस पगले दिल से मेरे
छत्तिस की ठन जाती है
नज़रें मेरी आंखें मेरी
चाटुक उसकी बन जाती हैं

वो खड़ी सामने शीशे के
जब अपने पर इतराती है
पऊडर की पूरी डिबिया
उन गालों पर मलवाती है
फ़िर ज्यादा लाली से चिढ़कर
होंठों पर झीभ नचाती है
सपनों की प्यारी गुड़िया
हरछठ माई बन जाती है
तब तब इस पगले दिल से मेरे
छत्तिस की ठन जाती है
नज़रें मेरी आंखें मेरी
चाटुक उसकी बन जाती हैं

वो पड़ोस के छोरे को
जब छिप कर देखा करती है
और चोरी पकड़ी जाने पर
दिन भर शर्माया करती है
जब दुष्ट सहेली से बिनती कर
खत लिखवाया करती है
और बदले में उसको अपनी
दो हरी चूड़ियां देती है
तब तब इस पगले दिल से मेरे
छत्तिस की ठन जाती है
नज़रें मेरी आंखें मेरी
चाटुक उसकी बन जाती हैं

Friday, January 16, 2009

मार देब गोली...केहू ना बोली...

आए गए कलंदर कितने ,
कितनों ने औकातें तोली.
पैल्वानों के लंगोटों की,
खैंच बना दी इसने चोली.
जिन्न भूतणी वाले भी तो,
मालिक के ही हैं हमजोली.
मार देब गोली...
केहू ना बोली...

मूंछण के लश्कारे वाले
सूरत हैगी किन्नी भोली.
करिया सांप संपोलों के,
फ़ुसकारे सी है इनकी बोली.
ढाई घर घोड़े ने किन्ने,
राजाओं की पोलें खोली.
मार देब गोली...
केहू ना बोली...

अग्गे पिछ्छू कौनो नाही ,
फ़िर भी हैं ये पूरी टोली.
लाल लंगोटण वालों की भी,
इनके आगे हिम्मत डोली .
छू काली कलकत्ते वाली,
इनकी हैंगी सखी सहेली.
मार देब गोली...
केहू ना बोली...

ताव चढ़े तो ऐसी तैसी,
कर न सके कोई बीच-बिचौली.
अड़ जाएं जो चौराहे तो,
लाल लहू की खेलें होली .
सुर्ख पठारी छाती इनकी
फ़िर भी दिल है पोली पोली .
मार देब गोली...
केहू ना बोली...

Wednesday, January 7, 2009

"लपक बबुरिया लपक"

कभी एक दुपहरी मेरी है ,
कोई एक सहर चल तू ले ले .
कभी मैं वज़ीर कभी तू पैदल
बस शह पड़ने की देरी है .
लपक बबुरिया लपक आज ,
कन्नी कटने की देरी है ...

कभी जीवन तेरा आल्हा है ,
कभी नाक-कटैया खेल हुआ .
कोई कंचा तू भी जीत गया,
कोई तेरी गोटी मेरी है .
लपक बबुरिया लपक आज ,
कन्नी कटने की देरी है ...

कोई महफ़िल तुझ पर लोट पड़ी ,
कोई आंगन टेढ़ा फ़िसल गया .
कभी डमरू लिए मदारी तुम ,
कभी चार गुलाटी तेरी है.
लपक बबुरिया लपक आज
कन्नी कटने की देरी है ...

कभी चौबे छब्बे बन बैठे ,
कभी दूबे बन कर लौटे हैं .
कोई एक पटाका फ़ुस्स हुआ ,
कोई चुटपुटिया रण-भेरी है .
लपक बबुरिया लपक आज
कन्नी कटने की देरी है ...

कभी घुंघरू बांधण चले रजा ,
कभी उनकी ही नथ उतरी है .
कोई नटवर ठग के लूट गया ,
कोई नंग धड़ंग अघोरी है .
लपक बबुरिया लपक आज
कन्नी कटने की देरी है ...

कभी सूप बजे तो ऐंवई है ,
कभी चलनी छेदन छींक गई .
कोई लौटा बनकर फ़न्ने खां ,
कोई करके चला दिलेरी है .
लपक बबुरिया लपक आज
कन्नी कटने की देरी है ...

Sunday, January 4, 2009

"चकला"

आज समाज के चकले में
अपनी मर्जी से
एक नई जुगनी आई है
खरी भी करारी भी
मुज़रे में तेरे मेरे
हमशकल
हूर नुमा साकी के
तलवे चाटते मिलेंगे
बंद नाक से
कांसे के गज़रे सूंघते
खून के कत्थे और
मास के लोथड़ों के
गुलकंद से ठसाठस
पान चबाते
और अपनी ही सफ़ेद
पोशाक पर थूंकते मिलेंगे
कोठे में ...
नीलामी करते दिखेंगे.
तवायफ़ अजीब है
नौलखा लेकर भी
खाली ठिंगन करेगी
दो चार बोल गा देती है
थोड़ा सा पल्लू
सरका देती है
बात तुम्हारे झूठे मान की है
तो अब नीलामी होगी
घंटे के हिसाब से
एक एक करके
दो कौड़ी के उसूल
करोड़ों में
गिरवी रखे जाएंगे
और उसके लंहगे
या फ़िर चोली में
रेशा रेशा बेशर्मियत से
टांक दिया जाएगा .
खुश होकर...
जुगनी अब नाचेगी
नथ उतरने तक
महफ़िल बारी बारी नंगी होगी
कहकहे लगते रहेंगे
जब तक अधेड़ उमर
अपने ही ठहाके से
बहरे ना हो जाएंगे.
अगले दिन होश आए
या फ़िर ठर्रा उतरे
तो बोझिल आंखों के
शटर उठाकर देख लेना
हाथ की उंगली में
टूटी नथ अटका के
लहंगे में तुम ही तो पड़े थे
रात भर कहरवे पर
'मधुबन में राधिका'
तुम ही तो नाचे थे .
शर्मिंदा मत होना ,
क्योंकि अगली रात
तुम्हारे गिरहबान
के सीखचे से
एक नई जुगनी झांक रही होगी
और कागज़ की रंडी बनने को
तैयार खड़ी होगी ....
अपना ही मुज़रा देखने को ..
गिरवी रखने को ..
दो चार उसूल लाए हो ना ...?

Thursday, January 1, 2009

बेसर

मेरी सोनजुही-पीला केसर
मेरी छनक धनक की नथ बेसर
मेरी अंखियों बसी,घुली हैरानी
बतियन मिसरी , दादी, 'नानी'
चटक रंग अल्हड़ छोरी
मेरे प्यार पगी कोरी कोरी
मेरी एक ख़ुदा , मेरी एक ख़ुदाई
मीर गज़ल , खैय्याम रुबाई
ओस-पलाशों की ओ छिटकन
मन्नत-मिन्नत-आलिंगन
तू जैसी है वैसी ही बनकर
पोने पोने पैरों चलकर
बिना तकल्लुफ़, बिना अर्ज़
बस हिया लगाए एक मर्ज़
बस धड़कन की ही तर्ज़-तर्ज़
दो चुम्बन प्यारे खर्च-खर्च
मेरे होंठो पर सिलने आ जा
सब छोड़ छाड़ रहने आ जा
'वो' कानों में कहने आ जा
तू जैसी है वैसी बनकर..
सब छोड़ छाड़ रहने आ जा ...

Thursday, October 23, 2008

सारी रात



रात,
स्वप्न की कुबड़ी लुगाई
नयन तले झाईं

रात,
नूर धुली कासी
चांद चढ़ा फ़ांसी

रात,
थकी पलकों की छीलन
अशेष नयनोन्मीलन

रात,
चंदा की मुहदिखाई
तारों की परजाई

रात,
करवट की दुकान
बिकाऊ पागल 'सचान'

रात,
गर्भवती दिमाग
प्रसव पीड़ा की जाग

रात,
सज़ा-ए-आफ़्ता गज़ल
खुदा ना खांसता ,बेदखल

रात,
झींगुर की गवाई
ढूंढी तकिया तले पाई

रात,
तेरे खयालों की चरसी
झपकी भर को तरसी

रात,
सब साली बातें
फ़िर भी ज़ाया रातें

" सैंतालिस "

मैं जिस जगह की बात कर रहा हूं वो लाहौर का सबसे जीवंत घर है . जीवंत इस मायने में कि जीवन यहां अपने सम्पूर्ण शबाब पर तकरीबन २५० वर्ग फ़ीट को अस्तित्व देने के अपने धंधे में बाकायदा सफ़ल हो पाया था.इस घर की दीवारों पर तस्वीरें नहीं हैं क्योंकि चेहरों पर तमाम तस्वीरें इतनी आशनाई से हर घड़ी खुशनुमा होती रहती हैं कि उन्हें दीवारों पर टांगने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती. छतों पर फ़ानूस नहीं लटकते , कण्डीलें नहीं टंगी हैं क्योंकि यहां उनकी खनक की कमी मुस्कुराहटों से पूरी कर दी जाती है . रईसियत के असबाब भी कमती ही नुमाया हैं क्योंकि यहां उन्हें जुटाने की न तो फ़ुरसत ही है किसी को और ना ही तकल्लुफ़ तनिक सा .
आंगन में नौ वर्ष की एक लड़की बैठी हुई है जो अपनी हंथेलियां एकान्तर क्रम में अलट पलट कर उन पर कभी पत्थर के गोल टुकड़े उछालती संभालती रहती है तो कभी फ़र्श पर एक मंझी हुई न्रित्यांगना की लचक और हनक के साथ चौकोर खानों के बीच लंगड़ी टांग खेल्ने लगती है . कुछ को ये किसी गौरैया का फ़ुदकना लग सकता है और बाकियों को कुछ भी नहीं क्योंकि उनके लिए मासूमियत के चोखे मोहपाश से बाहर निकलकर कुछ भी सोच पाने के स्थिति में खुद को ला पाना बेहद मुश्किल होता .
"बेबे हम कहां जा रहे हैं ? "
"पंजाब !! कितना मज़ा आएगा ना , मैंने ना वहां भी सारा दिन गोटियां ही खेलनी हैं और जब थक जाऊंगी ना तो खेलूंगी लंगड़ी टांग ....और फ़िर भी थक गई ना तो ....तो टांग बदल कर खेलूंगी लंगड़ी टांग ."
"एक दो तीन चार पांच ....पांचवां खाना ....
पांच चार तीन दो एक....घर - धप "
फ़िर लड़की कुछ गहरी सोच में कान पर हिफ़ाज़त से अटकी एक घुंघराली लट निकालकर उस पर उंगली से छल्ले बनाने लगी और अगले ही क्षण सारे छल्लों के एक लाइन में खींचकर होंठ पर मूंछ जैसी लगाकर खुद से बोली , "लेकिन दोनों टांगे थक गईं तब...तब तू क्या करेगी मंजीते?"
"मां ...क्या करूंगी मैं तब ? "
"तब मैं तेरे साथ खेलूंगी ...तू खेलेगी ना मेरे साथ बेबे....मेरी अच्छी बेबे..."
"हां मेरी चिड़ी ,खेलूंगी तेरे साथ. अच्छा ये ले , इसे चुन्नी के छोर से बांध ले अपनी "
"क्या है इस पुड़िया में बेबे ? "
"जादूगरनी की पुड़िया है मंजीते , जादूगरनी ने कहा था कि जब भी कलेजा घबराए तो एक सांस में फ़ांक लेना पूरी और चुटकी में सब चंगा "
"सब चंगा..!! जादूगरनी बेबे का चूरन "
लड़की हंसी और अगले ही पल आंख नचाती हुई बोली ....
"लेकिन मां ये छुरी क्यों बांधनी है कुर्ती से ? मैंने क्या कोई सब्जियां छीलनी हैं अम्रितसर जाकर . मैंने नी करना कोई काम वाम वहां ...बताए देती हूं बेबे "
"हां रे मेरी गुड़िया . बस ऐनू बांध ले तू . सिखणियां बांधती हैं ना इसे और तू है ना लाहौर की शेरनी "
लड़की सगर्व मुस्कुराती है ..."लाहौर की शेरनी....मंजीत कौर"
बताना मुश्किल होता है कि ऐसे में स्त्री-सुलभ गर्व अधिक खूबसूरत दिखता है या फ़िर मुस्कुराहट . लड़की फ़िर से खेलने में मशगूल हो गई .
"एक दो तीन चार पांच ....पांचवां खाना ....
पांच चार तीन दो एक....घर - धप "
"अरे कौन है दरवाज़े पर ? ...अरे भई इतनी ज़ोर से मत पीटो कुंडी किवाड़ ही टूट जाए....आ रही हूं ना "
"अरे कहा ना मत पीटो "
बेबे ने मंजी की बांह पकड़ कर उसे झटके से पीछे खींच लिया .
"नहीं खोलना दरवाज़ा , अंदर चल चुपचाप "
"नहीं खोलूं दरवाज़ा ? अरे देखने दे ना कौन है "
क्या...! अरे देखने दे ना "
बेबे उसे खींचकर घर के सबसे भीतर वाले कमरे में ले गई और किवाड़ सांकल से सटा दिए . धीरे धीरे शोर बढ़ने लगा , जैसे किसी हुज़ूम की आवाजें एक दूसरे के कंधे पर चढ़कर बहुत ऊंची चढ़ती जा रही हों .
"बेबे क्या हो रहा है बाहर ..ये लोग दरवाज़ा क्यों पीट रहे हैं ...
मां तू इतना कांप क्यों रही है ?
अरे कोई नहीं है मां , शायद दारजी होंगे दरवाज़े पर , मैं देख कर आती हूं अभी ..."
लड़की उठती कि उससे पहले भीड़ ने खिड़कियों से मशालें और पत्थर फ़ेंकना शुरू कर दिया था . दरवाज़े पर लट्ठों से लगातर ठोकरें मारी जा रही थीं .
अब तक मंजीत को भी समझ आना शुरू हो गया था कि मामला क्या है .
फ़िर भी लड़की मुस्कुराई ...लेकिन थोड़ा मुश्किल से .
"अरे मां तू डर मत ना और अपने पास वो पुड़िया भी है ना ..."
उसकी आंखों में चमक सी आई . मानों कोई तरीका मिल गया हो उनसे निबटने का .
मां ने भी ज़बरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश की और मुस्कुराने में सफ़ल भी हुई . मंजीत को मानो थोड़ा सा आश्वासन सा मिला कि हां वाकई पुड़िया में कुछ तो मंतर है जो उनका डर चुटकी में खतम कर देगा . दोनों ने चुन्नी के छोर से चूरन निकाला और एक झटके में हलक के नीचे धकेल दिया . पुड़िया में सचमुच मंतर था .
असर भी दिखा , दोनों का शरीर धीरे धीरे अकड़ना शुरू हो गया , गठरियां सी गुंथने लगीं . अंतणियां शायद चूरन हज़म नहीं करना चाहती थीं इसलिए सफ़ेद झाग के रूप में उसे मुंह के बाहर पम्प करने लगीं .
लेकिन एक बात तो तय थी कि उसमें मंतर था और डर सचमुच कम हो रहा था . वजह ये थी कि दिमाग के नसें इतनी शिथिल पड़ चुकी थीं कि उन्होंने 'डर' लव्ज़ का आगा पीछा सोचने में असमर्थता जता दी थी. हुज़ूम पागल हो रहा था .अब यहां पर एक दौड़ सी शुरू हो गई थी . दौड़ में हिस्सा लेने वाले तीन थे . छूटती हिम्मत , उखड़ती सांसें और टूटते दरवाज़े . दुर्भाग्य से दौड़ में सबसे आगे थे टूटते दरवाज़े और सबसे पीछे रह गई थी छूटती हुई हिम्मत . इतना भी तय था कि घर का अखिरी दरवाज़ा आखिरी सांस उखड़ने के पहले ही टूट जाता ... या शायद और भी बहुत पहले .
ज़बान से से कानों तक शब्द फ़ेंकने के लिए बहुत हिमम्त और मेहनत की ज़रूरत थी फ़िर भी मंजीत ने दोनों ज़रूरी चीज़ें बटोर कर कहा , " अभी भी डर लग रहा है...तेरी पुड़िया से कुछ नहीं होता "
कम्बख़्त ज़हर भी चोखा नहीं था . सिखणी ने कातर निगाहों से बच्ची को ऐसे देखा मानों उसका झूठ पकड़ा गया हो . शरीर में बची खुची सारी हिमम्त जुटाकर टीन का डिब्बा उठाया , तीन चौथाई मंजीत पर और एक चौथाई खुद पर उड़ेला . मंजीत पर थोड़ा ज्यादा , ताकि वो आसानी से जल सके और खुद पर कमती इसलिए ताकि वह भी जल सके , सुकून से ना सही ...थोड़ी मुश्किल से ही सही ...मगर जल सके . तीली दी गई...दोनों भम्म से जलने लगीं और अगले ही क्षण हुज़ूम ने आखिरी दरवाज़ा भी तोड़ दिया .
हुज़ूम हैरान था , सब के सब सन्न ...कोई हरकत नहीं . फटी आंखों में आग की लपटें आसानी से दिखाई पड़ रही थीं .
" अरे क्या सांप सूंघ गया है हरामियों ?
सोचते क्या हो ?
कुछ सांसे बाकी रह गई हैं सिखणियों में ...
देखते नहीं , अभी भी हरकतें हो रही हैं "
ललकार ने असर दिखाया , हुज़ूम का मौन टूटा .
मयानों से कुछ तलवारें निकाली गईं . दो जलते शरीर संख्या में चार कर दिए गए .
दो जनाने शरीर ....
सौभाग्य से छटपटाने में असमर्थ .
दो जनाने धड़ ....
दुर्भाग्य से छटपटाने में समर्थ .
और बीच में खून की फूटती लाल धार लेकिन इतनी पर्याप्त नहीं कि आग को बुझा सके .
लपट चिढ़ती जरूर थी लेकिन एक छौंक के साथ फ़िर से जलने लगती थी .
लाहौर का सबसे जीवंत घर सैंतालिस की भेंट चढ़ चुका था
और बाकी तमाम चढ़ने की तैयारी में थे.