तुझे याद है मां जब तुमने पहली बार कितनी मिन्नतों के बाद मुझे साग के दो कौर खिलाए थे . मैं घंटों तेरे चक्कर काटता रहता था और तेरे हांथों में निवाले वैसे के वैसे ...बिना चक्खे.. मुझे घूरते , चिढ़ाते रहते थे . और मैं उनकी शक्लें ऐसे देखा करता था गौया नीम की चटनी में परोसे गए हों . फ़िर भी तेरे कहने पर मैंने पहला कौरा जैसे तैसे निगला ..फ़िर दूसरा ..मैं कैसे अजीब से चेहरे बनाया करता था ना.
फ़िर तुमने पूछा कि कैसा है ..
मैंने कहा .."मीठा"
तुम हंसी थी ना ..
तुमने दुबारा पूछा..और मैंने दुबारा कहा कि हां ..मीठा ही तो.
......
आज काफ़ी सालों के बाद फ़िर किसी ने वैसा ही साग बना कर सामने रक्खा तो सचमुच तेरी याद आ गई .मैंने बड़े मन से साग का बड़ा सा निवाला खाया..
इश..
ये साग इतना तीता क्यूं है ..मैंने पूछा ...
उसने बोला ..
साग तीता ही होता है !!
.......
सच बोल ना मा...उस दिन भी तूने धोखे से अपनी उंगली ही चखाई थी ना...
Sunday, May 11, 2008
Sunday, April 6, 2008
पोस्टमार्टम
कल एक कत्ल हुआ है
एक शायर का
सुबूत के नाम पर
एक नज़र पड़ी मिली थी
जिसकी शकल किसी खंज़र से
काफ़ी कुछ मिलती सी थी
मुस्कुराती सी लाश की धड़कनें
रफ़्तार के नए गुमान में
अभी तक शायर के सीने पर
तालियां दे रही थीं
बेचारे की गूंगी कलम की ज़ुबान
किसी के लबों से सिली हुई
पाई गई ..
खैर..
अब उसकी नज़्में
सनाथ हो गई हैं
कुछ मायनों में अनाथ भी
स्याही ने खुशी खुशी
पन्नों का सफ़ेद वैधव्य त्याग दिया है
बेचारे के शब्दों का कुनबा
असंख्य से घट कर
ढ़ाई मात्र रह गया
कल्पना के पर शायर ने
कल ही तो कुतरे हैं
अधूरी पड़ी गज़लें खुद ही
अपना अन्त बांछा करती हैं
इर्शादों का टोटका भी
उसे बचा नहीं पाया
अर्ज़ की फ़ुरसत उसे रही नहीं
शुक्रिया की तहज़ीब भी उसने
कल ही तो त्यागी है
बेचारा शायर आजकल
पन्ने फ़ाड़ता फ़ेंकता रहता है
अपने अभागे मिसरों की चिंदियां
उसे सुकून देने लगी हैं
सुनने में आया कि
कल उसको
इश्क़ हो गया ....
शहर भर में उसे कोई
ठीक ठीक पहचान तो नहीं पाया
लेकिन मौका-ए-वारदात पर मुस्कुराती
गोल गोल आंखों वाली
एक चश्मदीद मोहतर्मा
उसका नाम 'निखिल' बताती हैं...
एक शायर का
सुबूत के नाम पर
एक नज़र पड़ी मिली थी
जिसकी शकल किसी खंज़र से
काफ़ी कुछ मिलती सी थी
मुस्कुराती सी लाश की धड़कनें
रफ़्तार के नए गुमान में
अभी तक शायर के सीने पर
तालियां दे रही थीं
बेचारे की गूंगी कलम की ज़ुबान
किसी के लबों से सिली हुई
पाई गई ..
खैर..
अब उसकी नज़्में
सनाथ हो गई हैं
कुछ मायनों में अनाथ भी
स्याही ने खुशी खुशी
पन्नों का सफ़ेद वैधव्य त्याग दिया है
बेचारे के शब्दों का कुनबा
असंख्य से घट कर
ढ़ाई मात्र रह गया
कल्पना के पर शायर ने
कल ही तो कुतरे हैं
अधूरी पड़ी गज़लें खुद ही
अपना अन्त बांछा करती हैं
इर्शादों का टोटका भी
उसे बचा नहीं पाया
अर्ज़ की फ़ुरसत उसे रही नहीं
शुक्रिया की तहज़ीब भी उसने
कल ही तो त्यागी है
बेचारा शायर आजकल
पन्ने फ़ाड़ता फ़ेंकता रहता है
अपने अभागे मिसरों की चिंदियां
उसे सुकून देने लगी हैं
सुनने में आया कि
कल उसको
इश्क़ हो गया ....
शहर भर में उसे कोई
ठीक ठीक पहचान तो नहीं पाया
लेकिन मौका-ए-वारदात पर मुस्कुराती
गोल गोल आंखों वाली
एक चश्मदीद मोहतर्मा
उसका नाम 'निखिल' बताती हैं...
Wednesday, March 19, 2008
अल्हड़ छोरी (हक़ीकत)
ऐंवैइ कोई ख्वाब़ पकड़कर
अगली पगली फ़िरती है
इश .. अपनी चंट मंडली संग
वो कितना हल्ला करती है !!
मेरी हर इक बात पकड़कर
इतना झगड़ा करती है
इश.. उंगली मेरी काट दांत से
दुष्ट चबाया करती है ..
ना जाने किसकी है नेमत
जो इतनी प्यारी दिखती है
क्या सूरज ..क्या बेनूर चन्द्रमा
सबसे बेहतर फ़बती है ...
मेरी सर्द हथेली वो
आंखों से चूमा करती है
क्या होश संभालूं जान तलक
जब मुझको घूरा करती है
वो सपनों की हरछठ माई
अब मेरे संग टहलती है
किस फ़ुरसत की वो हरकत है
धरती की है या जन्नत है
ना जाने कितनी पाक़ परी
जो इन्नी सोंणी लगती है
क्या सोनजुही क्या अली कली
उन सबसे बेहतर खिलती है ..
सारी दुनिया की दादी
बस मुझसे ही शर्माती है
इश..चिढ़ जाए फ़िर देखो तो
घंटों मिन्नत करवाती है
वो सबको तो घूरेगी पर ना
मुझसे नज़र मिलाती है
बस दाएं बाएं देखेगी
गठरी जैसी गुंथ जाती है
ना जाने कितनी अल्हड़ है
फ़िर भी इतना घबराती है
क्या छुई मुई क्या प्रथम पुष्प
सबसे ज्यादा शरमाती है .
जो अम्मा से सब कुछ कह दे
बस मेरी बात छिपाती है
बोला ना जाए झूठ मगर
फ़िर भी तो बात बनाती है
हर ज़र्रे तक उसको चाहूं
कितनी कस्में रखवाती है
वो अब भी छोटे दिए चार
अपने मंदिर धरवाती है
ना जाने कितनों की 'मिन्नत'
मेरी 'मन्नत' बन जाती है
क्या हसरत और क्या दुआ पाक़
किस्मत से ही मिल जाती है .
वो कविता की 'अल्हड़ छोरी' ...
जब अनायास मिल जाती है ...
तो सांसे क्या और धड़कन क्या
सब मेरे संग बह जाती हैं
अब कहां 'निखिल' क्या 'शब्द' मियां
सब ज़ुर्रत सी हो जाती हैं
ना तलब रही ना तड़प शेष
क्या सराबोर कर जाती है
तू कौन कबीले की ठगनी
अंगनी मंगनी कर जाती है
ना नगर बचें , ना कबर बचें
क्या झाड़ फ़ूंक कर जाती है .
अगली पगली फ़िरती है
इश .. अपनी चंट मंडली संग
वो कितना हल्ला करती है !!
मेरी हर इक बात पकड़कर
इतना झगड़ा करती है
इश.. उंगली मेरी काट दांत से
दुष्ट चबाया करती है ..
ना जाने किसकी है नेमत
जो इतनी प्यारी दिखती है
क्या सूरज ..क्या बेनूर चन्द्रमा
सबसे बेहतर फ़बती है ...
मेरी सर्द हथेली वो
आंखों से चूमा करती है
क्या होश संभालूं जान तलक
जब मुझको घूरा करती है
वो सपनों की हरछठ माई
अब मेरे संग टहलती है
किस फ़ुरसत की वो हरकत है
धरती की है या जन्नत है
ना जाने कितनी पाक़ परी
जो इन्नी सोंणी लगती है
क्या सोनजुही क्या अली कली
उन सबसे बेहतर खिलती है ..
सारी दुनिया की दादी
बस मुझसे ही शर्माती है
इश..चिढ़ जाए फ़िर देखो तो
घंटों मिन्नत करवाती है
वो सबको तो घूरेगी पर ना
मुझसे नज़र मिलाती है
बस दाएं बाएं देखेगी
गठरी जैसी गुंथ जाती है
ना जाने कितनी अल्हड़ है
फ़िर भी इतना घबराती है
क्या छुई मुई क्या प्रथम पुष्प
सबसे ज्यादा शरमाती है .
जो अम्मा से सब कुछ कह दे
बस मेरी बात छिपाती है
बोला ना जाए झूठ मगर
फ़िर भी तो बात बनाती है
हर ज़र्रे तक उसको चाहूं
कितनी कस्में रखवाती है
वो अब भी छोटे दिए चार
अपने मंदिर धरवाती है
ना जाने कितनों की 'मिन्नत'
मेरी 'मन्नत' बन जाती है
क्या हसरत और क्या दुआ पाक़
किस्मत से ही मिल जाती है .
वो कविता की 'अल्हड़ छोरी' ...
जब अनायास मिल जाती है ...
तो सांसे क्या और धड़कन क्या
सब मेरे संग बह जाती हैं
अब कहां 'निखिल' क्या 'शब्द' मियां
सब ज़ुर्रत सी हो जाती हैं
ना तलब रही ना तड़प शेष
क्या सराबोर कर जाती है
तू कौन कबीले की ठगनी
अंगनी मंगनी कर जाती है
ना नगर बचें , ना कबर बचें
क्या झाड़ फ़ूंक कर जाती है .
Thursday, March 13, 2008
मेरा कुछ सामान ..
आज कुछ सामान लिए बैठा हूं
टटोलता हूं तो
मेरी कैफ़ियत है..
जो हर रात
चांद के कटोरे से चुराकर
इकट्ठा की है .
तेरी छुअन है ...
जिसका ज़ायका
मेरी उंगली के
अखिरी कोने से
अभी तक चिपका है .
तेरी अखिरी टूटी
पलक का काला रेशम है
जिसके धागे से
मैंने एक बावला सा
सपना बांध रखा है .
तेरी एक ताज़ा
खिलखिलाहट भी है
जिसकी खनक से
मेरी अखिरी गज़ल
अभी तक ज़िन्दा है.
तेरे रूठने का
एक मज़ेदार किस्सा भी
और साथ में
मेरे मनाने की
दिलचस्प कश्मकश भी है .
मेरा सबसे कीमती
पहला आंसू है
जो कि तेरे
कांधे से ढुलकने से पहले
बटोरा हुआ है .
एक खन्ज़र है
जिसे तेरी नज़र से
चुपचाप तोड़ा था
उसकी धार का निशान
अभी भी सुर्ख़ और ताज़ा है .
एक नमाज़ की दुआ भी है
जिसके पल्लू से
कबूल होने की अर्ज़ी
सिली हुई है .
कुछ एक फ़ुटकर
हांफ़ते हुए
लंगड़े से कांटे हैं
जो तेरे इन्तज़ार में
आलसी घड़ी से
चिढ़कर उखाड़े थे .
एक पनपता सा प्यार है...
एक तू है ..
और एक मैं भी .
आज कुछ सामान लिए बैठा हूं .
सामान कीमती सा है .
टटोलता हूं तो
मेरी कैफ़ियत है..
जो हर रात
चांद के कटोरे से चुराकर
इकट्ठा की है .
तेरी छुअन है ...
जिसका ज़ायका
मेरी उंगली के
अखिरी कोने से
अभी तक चिपका है .
तेरी अखिरी टूटी
पलक का काला रेशम है
जिसके धागे से
मैंने एक बावला सा
सपना बांध रखा है .
तेरी एक ताज़ा
खिलखिलाहट भी है
जिसकी खनक से
मेरी अखिरी गज़ल
अभी तक ज़िन्दा है.
तेरे रूठने का
एक मज़ेदार किस्सा भी
और साथ में
मेरे मनाने की
दिलचस्प कश्मकश भी है .
मेरा सबसे कीमती
पहला आंसू है
जो कि तेरे
कांधे से ढुलकने से पहले
बटोरा हुआ है .
एक खन्ज़र है
जिसे तेरी नज़र से
चुपचाप तोड़ा था
उसकी धार का निशान
अभी भी सुर्ख़ और ताज़ा है .
एक नमाज़ की दुआ भी है
जिसके पल्लू से
कबूल होने की अर्ज़ी
सिली हुई है .
कुछ एक फ़ुटकर
हांफ़ते हुए
लंगड़े से कांटे हैं
जो तेरे इन्तज़ार में
आलसी घड़ी से
चिढ़कर उखाड़े थे .
एक पनपता सा प्यार है...
एक तू है ..
और एक मैं भी .
आज कुछ सामान लिए बैठा हूं .
सामान कीमती सा है .
"मैं शब्द हूं"
मैं अपने ही जीवन का पिघला सूरज हूं
जो अपने यश की कीर्ति निगलकर भस्म हो चला
मैं अपने ही उद्गम से भटका निर्झर हूं
जो अपने कद के भय से मिटकर बूंद हो चला
मैं उम्मीदों का सिन्धु डूबता उतराता सा
जो अपने तट की परिधि खोजता लुप्त हो चला
मैं सनेह का प्यासा भिक्षुक , आतुर , पागल
जो अपना भावुक तरल चूसकर ठूंठ हो चला
मैं अपने ही बोझिल फलकों पे इन्द्रधनुष सा
जो अपने रंग की चकाचौन्ध से नूर खो चला
मैं अपनी ही आंखों का आंसू बहा अलग सा
जो अपनी ही नजरों से गिरकर भूल हो चला
मैं अपनी रिसती कलम से छूटा शब्द अनोखा
जो पन्नों में फंसकर जीवन भर कैद हो चला
मैं अपने ही साहस का उड़ता मूर्ख पतन्गा
जो अन्तराग्नि में जलकर पल में छार हो चला
जो अपने यश की कीर्ति निगलकर भस्म हो चला
मैं अपने ही उद्गम से भटका निर्झर हूं
जो अपने कद के भय से मिटकर बूंद हो चला
मैं उम्मीदों का सिन्धु डूबता उतराता सा
जो अपने तट की परिधि खोजता लुप्त हो चला
मैं सनेह का प्यासा भिक्षुक , आतुर , पागल
जो अपना भावुक तरल चूसकर ठूंठ हो चला
मैं अपने ही बोझिल फलकों पे इन्द्रधनुष सा
जो अपने रंग की चकाचौन्ध से नूर खो चला
मैं अपनी ही आंखों का आंसू बहा अलग सा
जो अपनी ही नजरों से गिरकर भूल हो चला
मैं अपनी रिसती कलम से छूटा शब्द अनोखा
जो पन्नों में फंसकर जीवन भर कैद हो चला
मैं अपने ही साहस का उड़ता मूर्ख पतन्गा
जो अन्तराग्नि में जलकर पल में छार हो चला
पर कहने को..
वही कातर निगाहें..
वही उन्मुक्त सी बाहें..
वही ताकती राहें..
वही अनसुनी आहें..
वही तुम..
वही मैं ..
वही छटपटाता सा प्यार..
पर कहने को..
एक और नया साल..
वही उन्मुक्त सी बाहें..
वही ताकती राहें..
वही अनसुनी आहें..
वही तुम..
वही मैं ..
वही छटपटाता सा प्यार..
पर कहने को..
एक और नया साल..
शिद्दत
मैं आज भी
कलम जैसा कुछ
उठाता तो हूं
पर अब उसकी हलक में
शब्द नहीं रेंगा करते .
हरेक रात
पलकों के शामियाने
आंखों पर ढांक के
रखता भी हूं
पर कोरी झपकियां भी
ताने कसती हैं
रात संजीदा ही रहे
इसलिए ...
सांसों की आवाज़ें
भी नहीं करता
पर अखिरी बार कब
एक जोड़ी घन्टे सो पाया था...
कुछ ठीक से याद नहीं आता
कविताएं अब भी बनाता हूं
पर छन्दों में ढाल नहीं पाता
हरेक नज़्म तौला करता हूं
कम्ब्ख़्त कुछ हल्की सी लगती है
गोया चिढ़कर ...
गज़लों के कागज़..
फ़ाड़ता, फ़ेंकता रहता हूं .
हर दूसरे लम्हें से
रूठ बैठता हूं
पर तेरी मुस्कुराहटों की खनक
यहां तक आती है...
सबसे मिलता भी हूं
पर सब के सब
तेरी परछाइयों के
नमूने से लगते हैं..
तू कभी कुछ खुल कर
नहीं कहती
पर इश्क़ की "हां"
तेरे होठों पर
अभी तक...
चिपकी सी दिखती है .
शायद अभी कुछ बोल बैठेगी
इसी खुश-फ़हमी
की किश्तों में
सांसे गिरवी रखा करता हूं
तुझ पर कुछ खास हक़
नहीं बनता मेरा
लेकिन तेरे जूड़े पे
कभी कभी
मेरे शब्द गुंथे मिल जाते हैं
कांधे के तिल
महावर की लाली
गालों के भंवर
और आंखों की पलकों पर
मेरी गज़लें
अटकी सी मिला करती हैं...
तू इश्क़ में हां कहने
में वक़्त लेने की
अपनी आदत से परेशां है..
और मैं उस आदत की
शिद्दत से..
तू मेरी गज़लों की
नापाक फ़ितरत से परेशां है
और मैं तेरी बेहद पाक
मासूमियत से...
कलम जैसा कुछ
उठाता तो हूं
पर अब उसकी हलक में
शब्द नहीं रेंगा करते .
हरेक रात
पलकों के शामियाने
आंखों पर ढांक के
रखता भी हूं
पर कोरी झपकियां भी
ताने कसती हैं
रात संजीदा ही रहे
इसलिए ...
सांसों की आवाज़ें
भी नहीं करता
पर अखिरी बार कब
एक जोड़ी घन्टे सो पाया था...
कुछ ठीक से याद नहीं आता
कविताएं अब भी बनाता हूं
पर छन्दों में ढाल नहीं पाता
हरेक नज़्म तौला करता हूं
कम्ब्ख़्त कुछ हल्की सी लगती है
गोया चिढ़कर ...
गज़लों के कागज़..
फ़ाड़ता, फ़ेंकता रहता हूं .
हर दूसरे लम्हें से
रूठ बैठता हूं
पर तेरी मुस्कुराहटों की खनक
यहां तक आती है...
सबसे मिलता भी हूं
पर सब के सब
तेरी परछाइयों के
नमूने से लगते हैं..
तू कभी कुछ खुल कर
नहीं कहती
पर इश्क़ की "हां"
तेरे होठों पर
अभी तक...
चिपकी सी दिखती है .
शायद अभी कुछ बोल बैठेगी
इसी खुश-फ़हमी
की किश्तों में
सांसे गिरवी रखा करता हूं
तुझ पर कुछ खास हक़
नहीं बनता मेरा
लेकिन तेरे जूड़े पे
कभी कभी
मेरे शब्द गुंथे मिल जाते हैं
कांधे के तिल
महावर की लाली
गालों के भंवर
और आंखों की पलकों पर
मेरी गज़लें
अटकी सी मिला करती हैं...
तू इश्क़ में हां कहने
में वक़्त लेने की
अपनी आदत से परेशां है..
और मैं उस आदत की
शिद्दत से..
तू मेरी गज़लों की
नापाक फ़ितरत से परेशां है
और मैं तेरी बेहद पाक
मासूमियत से...
Subscribe to:
Posts (Atom)
