Sunday, August 24, 2008

मंत्र मंत्र मातरा मंतव्य मारता
कपोल कल्पना कुतर्क कथ्य काटता
खु़मार ख़ांसता ख़राशें खोदता ख़ुदा
गोपनीय गर्भित गन्तव्य ग़ुमशुदा.

Saturday, July 19, 2008

दो गोल काली कश्तियां

एक जोड़ा मुकम्मल,फ़ीका चांद
कतरनों से बुने त्रिपाल
ख़ुसरो की रूबाई
या फ़िर उसके ही
अनाथ पड़े फ़िरदौस जैसा कुछ
बेहिसाब, बेहिज़ाब-बेजान
गुमां , हया और अदा
जैसे कई नामों वली
दिन भर हैरान
परेशान
लटटू सी नाचतीं
दो दशकों से
गश्त लगातीं
दो गोल काली कश्तियां
कई बूंद तकदीर की
पिघली हुई आशनाई
पलकें ..? या फ़िर ..
चाटुकारिता के पैबंद ...
कुल मिला कर कहूं
तो..
मेरी ही आंखें..

ओस के इस नशेमन में
कभी तुम भी रहा करती थीं
साधिकार..सगर्व..
अपना ही घरौंदा मानकर
पूरे हक़ से
आजकल तो गाहे बगाहे
सावन और जेठ में ही
आया करती हो
और दो माह का
किराया देना भी नहीं भूलती..
शायद भूल गई हो
कि ये आंखे तुम्हारा ही
घरौंदा हुआ करती थीं
और ये पलकें
उसी के तिनके
अब जो ये बूढ़ा चांद और
दो गोल काली भटकती कश्तियां
नज़र आती हैं..
कभी उनमें भी
ज़िन्दगी की
चहल पहल हुआ करती थी..



Saturday, June 14, 2008

मुसव्विर का ... सीला सा तसव्वुर...

सुदूर उत्तर
कू-ए-यार
ख़ुर्शीद की बस्ती
मकान नम्बर सात
नीली हवेली
पेशे से कोई मुसव्विर
आंगन के पिछवाड़े
आकाश-गंगा का धोभी-घाट
मरासिमों के खंभों का बांधता
बिजली का एक नंगा तार
और उस पर..
निचोड़ कर टांगा हुआ
उसी मुसव्विर का एक
सीला सा तसव्वुर
चटकती सुबहो से
कल देर शब तक सूखता रहा
और धरती वाले
उसी की सीलन में
जी भर के भीगते रहे
कुछ धोखा सा हुआ है शायद
कि आज फ़िर
बेपनाह बारिश हुई है....

Sunday, May 11, 2008

for mothers day ..

तुझे याद है मां जब तुमने पहली बार कितनी मिन्नतों के बाद मुझे साग के दो कौर खिलाए थे . मैं घंटों तेरे चक्कर काटता रहता था और तेरे हांथों में निवाले वैसे के वैसे ...बिना चक्खे.. मुझे घूरते , चिढ़ाते रहते थे . और मैं उनकी शक्लें ऐसे देखा करता था गौया नीम की चटनी में परोसे गए हों . फ़िर भी तेरे कहने पर मैंने पहला कौरा जैसे तैसे निगला ..फ़िर दूसरा ..मैं कैसे अजीब से चेहरे बनाया करता था ना.
फ़िर तुमने पूछा कि कैसा है ..
मैंने कहा .."मीठा"
तुम हंसी थी ना ..
तुमने दुबारा पूछा..और मैंने दुबारा कहा कि हां ..मीठा ही तो.

......

आज काफ़ी सालों के बाद फ़िर किसी ने वैसा ही साग बना कर सामने रक्खा तो सचमुच तेरी याद आ गई .मैंने बड़े मन से साग का बड़ा सा निवाला खाया..
इश..
ये साग इतना तीता क्यूं है ..मैंने पूछा ...
उसने बोला ..
साग तीता ही होता है !!

.......

सच बोल ना मा...उस दिन भी तूने धोखे से अपनी उंगली ही चखाई थी ना...

Sunday, April 6, 2008

पोस्टमार्टम

कल एक कत्ल हुआ है
एक शायर का
सुबूत के नाम पर
एक नज़र पड़ी मिली थी
जिसकी शकल किसी खंज़र से
काफ़ी कुछ मिलती सी थी
मुस्कुराती सी लाश की धड़कनें
रफ़्तार के नए गुमान में
अभी तक शायर के सीने पर
तालियां दे रही थीं
बेचारे की गूंगी कलम की ज़ुबान
किसी के लबों से सिली हुई
पाई गई ..
खैर..
अब उसकी नज़्में
सनाथ हो गई हैं
कुछ मायनों में अनाथ भी
स्याही ने खुशी खुशी
पन्नों का सफ़ेद वैधव्य त्याग दिया है
बेचारे के शब्दों का कुनबा
असंख्य से घट कर
ढ़ाई मात्र रह गया
कल्पना के पर शायर ने
कल ही तो कुतरे हैं
अधूरी पड़ी गज़लें खुद ही
अपना अन्त बांछा करती हैं
इर्शादों का टोटका भी
उसे बचा नहीं पाया
अर्ज़ की फ़ुरसत उसे रही नहीं
शुक्रिया की तहज़ीब भी उसने
कल ही तो त्यागी है
बेचारा शायर आजकल
पन्ने फ़ाड़ता फ़ेंकता रहता है
अपने अभागे मिसरों की चिंदियां
उसे सुकून देने लगी हैं
सुनने में आया कि
कल उसको
इश्क़ हो गया ....
शहर भर में उसे कोई
ठीक ठीक पहचान तो नहीं पाया
लेकिन मौका-ए-वारदात पर मुस्कुराती
गोल गोल आंखों वाली
एक चश्मदीद मोहतर्मा
उसका नाम 'निखिल' बताती हैं...

Wednesday, March 19, 2008

अल्हड़ छोरी (हक़ीकत)

ऐंवैइ कोई ख्वाब़ पकड़कर
अगली पगली फ़िरती है
इश .. अपनी चंट मंडली संग
वो कितना हल्ला करती है !!
मेरी हर इक बात पकड़कर
इतना झगड़ा करती है
इश.. उंगली मेरी काट दांत से
दुष्ट चबाया करती है ..
ना जाने किसकी है नेमत
जो इतनी प्यारी दिखती है
क्या सूरज ..क्या बेनूर चन्द्रमा
सबसे बेहतर फ़बती है ...

मेरी सर्द हथेली वो
आंखों से चूमा करती है
क्या होश संभालूं जान तलक
जब मुझको घूरा करती है
वो सपनों की हरछठ माई
अब मेरे संग टहलती है
किस फ़ुरसत की वो हरकत है
धरती की है या जन्नत है
ना जाने कितनी पाक़ परी
जो इन्नी सोंणी लगती है
क्या सोनजुही क्या अली कली
उन सबसे बेहतर खिलती है ..

सारी दुनिया की दादी
बस मुझसे ही शर्माती है
इश..चिढ़ जाए फ़िर देखो तो
घंटों मिन्नत करवाती है
वो सबको तो घूरेगी पर ना
मुझसे नज़र मिलाती है
बस दाएं बाएं देखेगी
गठरी जैसी गुंथ जाती है
ना जाने कितनी अल्हड़ है
फ़िर भी इतना घबराती है
क्या छुई मुई क्या प्रथम पुष्प
सबसे ज्यादा शरमाती है .

जो अम्मा से सब कुछ कह दे
बस मेरी बात छिपाती है
बोला ना जाए झूठ मगर
फ़िर भी तो बात बनाती है
हर ज़र्रे तक उसको चाहूं
कितनी कस्में रखवाती है
वो अब भी छोटे दिए चार
अपने मंदिर धरवाती है
ना जाने कितनों की 'मिन्नत'
मेरी 'मन्नत' बन जाती है
क्या हसरत और क्या दुआ पाक़
किस्मत से ही मिल जाती है .

वो कविता की 'अल्हड़ छोरी' ...
जब अनायास मिल जाती है ...
तो सांसे क्या और धड़कन क्या
सब मेरे संग बह जाती हैं
अब कहां 'निखिल' क्या 'शब्द' मियां
सब ज़ुर्रत सी हो जाती हैं
ना तलब रही ना तड़प शेष
क्या सराबोर कर जाती है
तू कौन कबीले की ठगनी
अंगनी मंगनी कर जाती है
ना नगर बचें , ना कबर बचें
क्या झाड़ फ़ूंक कर जाती है .

Thursday, March 13, 2008

मेरा कुछ सामान ..

आज कुछ सामान लिए बैठा हूं
टटोलता हूं तो
मेरी कैफ़ियत है..
जो हर रात
चांद के कटोरे से चुराकर
इकट्ठा की है .
तेरी छुअन है ...
जिसका ज़ायका
मेरी उंगली के
अखिरी कोने से
अभी तक चिपका है .
तेरी अखिरी टूटी
पलक का काला रेशम है
जिसके धागे से
मैंने एक बावला सा
सपना बांध रखा है .
तेरी एक ताज़ा
खिलखिलाहट भी है
जिसकी खनक से
मेरी अखिरी गज़ल
अभी तक ज़िन्दा है.
तेरे रूठने का
एक मज़ेदार किस्सा भी
और साथ में
मेरे मनाने की
दिलचस्प कश्मकश भी है .
मेरा सबसे कीमती
पहला आंसू है
जो कि तेरे
कांधे से ढुलकने से पहले
बटोरा हुआ है .
एक खन्ज़र है
जिसे तेरी नज़र से
चुपचाप तोड़ा था
उसकी धार का निशान
अभी भी सुर्ख़ और ताज़ा है .
एक नमाज़ की दुआ भी है
जिसके पल्लू से
कबूल होने की अर्ज़ी
सिली हुई है .
कुछ एक फ़ुटकर
हांफ़ते हुए
लंगड़े से कांटे हैं
जो तेरे इन्तज़ार में
आलसी घड़ी से
चिढ़कर उखाड़े थे .
एक पनपता सा प्यार है...
एक तू है ..
और एक मैं भी .
आज कुछ सामान लिए बैठा हूं .
सामान कीमती सा है .