Tuesday, October 13, 2009

सज़ा -ए-आफ़ता...

सज़ा -ए-आफ़ता हैं , गिरफ्तार हैं सनम
हम फसाद-ए-इश्क़ तड़ीपार हैं सनम

एक रोग , एक मर्ज़ ही सियाने हैं
बाकी धंधे निरे चिड़ीमार हैंगे हम

दुनियादारी की गणित में मूर्ख है 'सचान'
दिल्लगी के सिवा उसे कुछ नहीं हज़म

जितनी चाहे उतनी मुहब्बत कराइए
कोई हरा नोट नहीं इश्क़ का ख़सम

तोहमतें लगा लो या जी कहो काइयां
साग , रोटी , झोपड़े दो कौड़ी के वहम

अम्मियों की जूतियों की हमें फ़िक्र क्या
भांग तगड़ी इश्क़ की , कवारे हैं सनम

जान गए , जान के हुए हैं बेशरम
इश्क़ खुदा , खुदा इश्क़ , मिट गए वहम

जो भी चाहे समझो , अपनी राय दीजिए
हमपे कौन से उधार हैं तेरे करम

6 comments:

Varun said...

Bahut hi shaandaar! Bahut dinon baad kuchh itna bebaak padha....

Unknown said...

bin tere sanam, mar mitenge hum :)

good work

Praharsh Sharma said...

Ishwar se yahi shubh-kamna karte hain ki aap sada saza-e-afta rahein .. :)
ek bahut hi sundar aur alag rachna padhne ko mili.. rom rom jaag utha.. bas hare note ka bhi kuch to dhyan karna.. :)

Ashish said...

ab kya tarif karoon ...
Itne logon ne sab toh kar diya ...
bas ek hi cheez hai bhai sachan ki "baat dil ko choo gayi" :)

-Ashish Ranjan

vakrachakshu said...

@ All

behad shukriya ji :)

Anonymous said...

सज़ा -ए-आफ़ता हैं , गिरफ्तार हैं सनम
हम फसाद-ए-इश्क़ तड़ीपार हैं सनम

एक रोग , एक मर्ज़ ही सियाने हैं
बाकी धंधे निरे चिड़ीमार हैंगे हम

दुनियादारी की गणित में मूर्ख है 'सचान'
दिल्लगी के सिवा उसे कुछ नहीं हज़म

जितनी चाहे उतनी मुहब्बत कराइए
कोई हरा नोट नहीं इश्क़ का ख़सम



अम्मियों की जूतियों की हमें फ़िक्र क्या
भांग तगड़ी इश्क़ की , कवारे हैं सनम

vaise to saari lines bahot sateek thi, but ye in particular ek asli aashiq ki pehchaan hai...
tumne kuch naya kyu nai likha hai bahot dino se??
waiting to read something fresh.....